जनपद पंचायत पुसौर में ऐसा भी होता है क्या? मनरेगा में कमीशन दो और नाली निर्माण पाओ!

रायगढ़। जनपद पंचायत पुसौर में लंबे समय से भ्रष्टाचार और मनमानी के कई मामले सामने आते रहे हैं, लेकिन अब मनरेगा कार्यों में खुलेआम कमीशनखोरी की चर्चाएँ क्षेत्र में तेज हो चुकी हैं। औपचारिक बातचीत के दौरान कई जनप्रतिनिधियों ने बताया कि पंचायतों में विकास कार्यों की स्वीकृति अब पात्रता, आवश्यकता या जनहित के आधार पर नहीं, बल्कि “कमीशन” के आधार पर तय होने लगी है।
सूत्रों के अनुसार, मनरेगा अंतर्गत स्वीकृत होने वाले नाली निर्माण, मिट्टी कार्य, तालाब गहरीकरण जैसे कार्यों में जनपद स्तर के कुछ अधिकारी नियमों की बजाय “लिफाफा संस्कृति” को तरजीह दे रहे हैं। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जिस पंचायत से अधिक कमीशन की पेशकश की जाती है, उसी पंचायत के प्रस्ताव को प्राथमिकता देकर तत्काल स्वीकृति जारी कर दी जाती है। जिन पंचायतों में जनप्रतिनिधि या ग्रामीण किसी भी प्रकार की अवैध लेनदेन से इनकार कर देते हैं, वहां के विकास प्रस्ताव महीनों तक फाइलों में ही दबे रह जाते हैं।
स्थानीय प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि “मनरेगा में नाली बनवाना है? तो अधिकारी के टेबल पर लिफाफा रख दो, उसी दिन सेटलमेंट हो जाएगा।” यह भी आरोप है कि कुछ कर्मचारी-अधिकारी तो खुले तौर पर संकेत देते हैं कि काम करवाना है तो “टेबल पर पानी” तक की व्यवस्था करनी होगी।
ग्रामीण क्षेत्र में मनरेगा ही एकमात्र ऐसी योजना है, जो मजदूरों को रोजगार देती है और गांवों में बुनियादी ढांचा तैयार करती है। लेकिन यदि इसी योजना में भ्रष्टाचार हावी हो जाए, तो ग्रामीण विकास की आशाएं धूमिल हो जाती हैं। जनपद पंचायत पुसौर में चल रहे कथित कमीशनखोरी के इस खेल पर रोक लग सके और विकास कार्य पारदर्शिता से हो सकें।
पुसौर क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। जनता अब जांच और कार्रवाई की उम्मीद में जिला प्रशासन की ओर देख रही है।



