
रायगढ़ :-छत्तीसगढ़ की शिक्षा नीति आज एक बड़े विमर्श के दौर से गुजर रही है। वर्षों से यह आरोप लगता रहा है कि शासकीय स्कूलों में योजनाओं और संसाधनों की कोई कमी नहीं है, फिर भी शिक्षा की गुणवत्ता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही। इसी बीच यह मांग जोर पकड़ रही है कि शासकीय शिक्षक, शासकीय अधिकारी एवं कर्मचारियों के बच्चों या परिवार के बच्चों को शासकीय स्कूलों में पढ़ाना अनिवार्य किया जाए। सवाल यह है कि क्या इस नियम के लागू होते ही शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार आएगा, या यह भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा?
यदि यह नियम ईमानदारी से लागू होता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि शासकीय स्कूलों की तस्वीर बदल सकती है। जब शिक्षक और अधिकारी अपने ही बच्चों को उसी स्कूल में पढ़ते देखेंगे, तो स्वाभाविक रूप से पढ़ाई की गुणवत्ता, अनुशासन, समयपालन और संसाधनों के बेहतर उपयोग पर अधिक ध्यान देंगे। कक्षाओं में लापरवाही, शिक्षक अनुपस्थिति और नाममात्र की पढ़ाई जैसी समस्याओं पर स्वतः लगाम लगेगी। स्कूल केवल नौकरी का स्थान नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण का केंद्र बनेंगे।
लेकिन केवल नियम बना देना ही पर्याप्त नहीं है। यदि बुनियादी सुविधाएं, योग्य शिक्षकों की उपलब्धता, आधुनिक शिक्षण सामग्री, डिजिटल संसाधन और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित नहीं किए गए, तो यह व्यवस्था भी दिखावटी साबित हो सकती है। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए नीति को व्यावहारिक और लचीला बनाना होगा, ताकि शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखा जा सके।
साथ ही, शिक्षकों के निरंतर प्रशिक्षण, निष्पक्ष मूल्यांकन और जवाबदेही तय करना भी जरूरी है। जब तक शिक्षा व्यवस्था में विश्वास पैदा नहीं होगा, तब तक कोई भी आदेश केवल कागजों में सीमित रह जाएगा।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शासकीय शिक्षक व अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का नियम शिक्षा गुणवत्ता सुधार की दिशा में एक मजबूत कदम हो सकता है, लेकिन तभी, जब इसके साथ ठोस सुधार, संसाधन और ईमानदार क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए। अन्यथा, यह भी एक और अधूरी नीति बनकर रह



