खरसिया विधानसभा क्षेत्र में भाजपा नेताओं को नेतागिरी की सीख—पद, पार्टी और विचारधारा की मर्यादा समझना जरूरी!

रायगढ़ :-खरसिया विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के बड़े नेताओं के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि नेतागिरी केवल मंच साझा करने या कैमरे के सामने दिखने का नाम नहीं, बल्कि विचारधारा, संगठनात्मक अनुशासन और जनभावनाओं की समझ का विषय है। यदि कोई नेता किसी संवैधानिक पद पर आसीन है, तो सर्वदलीय मंच साझा करना उसकी जिम्मेदारी और शिष्टाचार का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जो स्वयं को भाजपा का बड़ा नेता मानते हैं, उनसे पार्टी और कार्यकर्ताओं को अपेक्षा होती है कि वे संगठन की मर्यादाओं का पालन करें।
बार-बार गैर पार्टी नेताओं के साथ मंच साझा करना, वह भी बिना स्पष्ट राजनीतिक संदेश के, पार्टी की मूल विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों के मन में भ्रम पैदा करता है। जनता सवाल पूछती है—क्या यह अवसरवाद है, या वैचारिक अस्पष्टता? यह अबूझ सीख आगे चलकर चुनावी नुकसान का कारण बनती है, क्योंकि कार्यकर्ता का उत्साह और मतदाता का भरोसा दोनों कमजोर पड़ते हैं।
भाजपा की पहचान अनुशासन, स्पष्ट विचारधारा और मजबूत संगठन से रही है। खरसिया में भी यही अपेक्षा है कि नेता कार्यकर्ता-आधारित राजनीति करें, न कि मंच-साझेदारी आधारित। स्थानीय मुद्दों—शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसान और युवाओं—पर ठोस पहल दिखे, न कि केवल फोटो और भाषण। विचारधारा से समझौता कर बनाई गई निकटताएं चुनावी समय में गतिविधि परिणाम के रूप में सामने आती हैं, जहां समर्थन बिखरता है और संदेश धुंधला हो जाता है।
नेतागिरी की सही सीख यही है कि पद और पार्टी की सीमा समझी जाए, संगठन के निर्णयों का सम्मान हो, और मंच का उपयोग जनता को दिशा देने के लिए हो—भ्रम पैदा करने के लिए नहीं। खरसिया के भाजपा नेताओं को यह याद रखना होगा कि कार्यकर्ता की भावना ही पार्टी की असली पूंजी है। यदि उसी को विचलित किया गया, तो उसका हिसाब चुनावी नतीजों में जरूर चुकाना पड़ेगा।



