
भक्तमाता कर्मा की 1008 वीं जयंती 5अप्रैल को
साहू समाज ने रखा विविध कार्यक्रम
मेरी माँ कर्मा सामाजिक व धार्मिक फ़िल्म गैलेक्सी सिनेमा व
रामनिवास टाकीज में शुक्रवार को होगी रिलीज
संत माता कर्मा की जीवनी : नेतराम साहू की कलम से
रायगढ़ : साहू समाज रायगढ़ ने साहू समाज की आराध्य देवी भक्त माता कर्मा की 1008 वीं जयंती के अवसर पर दिनांक 5 अप्रैल 2024 शुक्रवार को प्रातः 8:00 बजे कर्मा कृष्ण मंदिर श्रीश्री सत्यनारायण बाबा धाम कोसमनारा रायगढ़ में भक्तमाता कर्मा की पूजन -अर्चन -हवन कर महा आरती होगी।
खिचड़ी प्रसाद का वितरण होगा। भजन, कीर्तन, सामाजिक, व्याख्यान, कर्मा महात्यम पर चर्चा होगी।
संस्कृतिक कार्यक्रम
5 अप्रैल 2024 को ही संध्या 5:00 बजे कर्मा साहू सामुदायिक भवन मरीन ड्राइव रोड, केलो तट, रायगढ़ में सांस्कृतिक कार्यक्रम होगी।
मेरी माँ कर्मा फ़िल्म रिलीज
बहु प्रतीक्षित सामाजिक धार्मिक फ़िल्म “मेरी माँ कर्मा” फ़िल्म रायगढ़ के गैलेक्सी (मॉल) सिनेमा व रामनिवास टॉकीज में प्रदर्शित हो रही है। जिसे टिकिट बुक कर परिवार मित्र सहित देख सकते हैं।
भक्त माता कर्मा की जीवनी
हजार आठ वर्ष पूर्व झांसी (उत्तरप्रदेश) में श्री रामशाह जी प्रतिष्ठित तेल व्यापारी थे। वे एक समाज सुधारक, दयालु , धर्मात्मा एवं परोपकारी व्यक्ति थे। एक हजार आठ वर्ष पूर्व उनकी पत्नी को शुभ नक्षत्र, चैत्र माह के कृष्ण-पक्ष की एकादशी को विक्रम संवत 1073 में एक कन्या का जन्म हुआ।
माँ कर्मा की जयंती- योग,लग्न,ग्रह,वार,तिथि
जन्म – 3 मार्च 1017
दिन -सोमवार
माह- चैत्र (पूर्णिमांत)
चंद्र राशि -मकर
सूर्य राशि -मीन
ऋतु- बसंत
आयन- उत्तरायण
संवत्सर -नल
संवत्सर(उत्तर) -कलयुक्त
विक्रम संवत -1073
शक संवत -938
तिथि- एकादशी
पक्ष – कृष्ण
नक्षत्र -उत्तराषाढ़ा
योग – परिघ
करण -बालव
करण- कौलव
वार -सोमवार
विद्वान पण्डितो ने कन्या की जन्मपत्री बनाकर ग्रह, नक्षत्र का शोधन करके कहा- रामशाह तुम बहुत ही भाग्यवान हो, जो ऐसी गुणवान कन्या ने तुम्हारे यहां जन्म लिया है, यह भगवान की उपासक बनेगी। शास्त्रानुसार पुत्री का नाम “कर्माबाई” रखा गया।
बाल्यावस्था से ही कर्मा जी को धार्मिक कहानियां सुनने की अधिक रुचि हो गई थी, यह भक्ति भाव गति से बढ़ता गया।
कर्मा जी के विवाह योग्य हो जाने पर उनका विवाह नरवर ग्राम के प्रतिष्ठित व्यापारी के पुत्र के साथ कर दिया गया। पति सेवा के पश्चात कर्माबाई को जितना भी समय मिलता था वह समय भगवान श्री कृष्ण के भजन-पूजन ध्यान आदि में लगाती थी। उनके पति पूजा, पाठ आदि को केवल धार्मिक अंधविश्वास ही कहते थे। एक दिन संध्या को भगवान श्री कृष्ण जी की मूर्ति के पास बैठी कर्माबाई भजन गा रही थी और भगवान के ध्यान में मुग्ध थी। एकाएक उनके पति ने आकर भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति सिंहासन पर से उठाकर छिपा दी। कर्मा ने जब नेत्र खोले तो भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति को अपने स्थान पर ना देखकर एकदम आश्चर्यचकित होकर चारों तरफ देखने लगी और घबराकर गिर पड़ी, गिरते ही वह मूर्छित हो गई, उनके पति ने तुरंत अपनी गोद में उठा लिया और भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति देकर कहने लगे कि इनकी भक्ति करते करते इतना समय व्यतीत हो चुका है। कभी साक्षात प्रभु के दर्शन भी हुए हैं। कर्मा ने उत्तर दिया मैं विश्वास रखती हूं कि एक न एक दिन मुझे बंशीधारी के दर्शन अवश्य ही होगे।
सामाजिक और धार्मिक कार्यो में तन, मन, और धन से लगन लगनपूर्वक लगे रहना उनमें अत्यधिक रुचि रखना, दीन-दुखियों के प्रति दया भावना रखना । इन सभी करणों से कर्माबाई का यशगान नरवर ग्राम (ससुराल) में बडी तेजी से फैलने लगा । उसी समय नरवर के राजा के हाथी को खुजली रोग हो गया था । जिसे राज्य के श्रेष्ठ वैद्यों के उपचार से भी ठीक नही किया जा सका । हाथी की खुजली ठीक करने हेतु उसे तेल से भरे कुण्ड में नहलाने का सुझाव किसी ने राजा को दिया। राज्य के समस्त तेलकारों को राजा के द्वारा आदेश दिया गया कि वे अपना समस्त तेल बिना मूल्य के एक कुण्ड में डालें जिससे कि वह कुण्ड भर जावें । राजा के अन्याय के कारण अधिकांश तेलकार भूखों मरने लगें एक माह के पश्चात भी अन्यायी राजा का कुण्ड तेल से ना भरा जा सका । इस अन्याय से दुखी होकर कर्माबाई श्री कृष्ण भगवान के चरणों में गिर पडी और रोकर कहने लगी हे दयामय मुरलीधारी निर्धनों, निर्बलों की रक्षा कीजिये। भगवान की कृपा से दूसरे दिन प्रातः राजा ने कुण्ड को तेल से भरा पाया । तब भगवान के चमत्कार को समझ कर राजा ने कर्मा जी से क्षमा मांगी ।
एक बार कर्मा जी के पति बहुत बीमार हो गये थे बहुत उपचार के उपरान्त भी उन्हें नहीं बचाया जा सका । पति के स्वर्गवास हो जाने पर कर्मा पागल की भांति श्री कृष्ण के चरणों में जाकर फूट-फूटकर रोने लगी और कहा- हे दीनानाथ भगवान तूने मुझे विधवा बना दिया व मेरा सुहाग छीनकर मुझे असहाय कर दिया है । तुम्हें अपने भक्तों पर दया दृष्टि रखना चाहिेए । पति के स्वर्गवास होने के तीन माह उपरान्त कर्मा जी के द्वितीय पुत्र का जन्म हुआ । उसका प्रतिदिन का समय दोनों बालको के लालन-पालन और भगवान की भक्ति में व्यतीत हो जाता था ।तीन वर्ष के पश्चात् कर्मा को भगवान के दर्शन करने की प्रबल इच्छा हुई तब एक दिन सुध-बुध भूलकर आधी रात के समय अपने वृध्द माता पिता और दोनो बच्चों को सोता छोडकर प्रभु के ध्यान में लीन घर से निकल गई । घोर अंधकार को चीरती हुई भगवान जगन्नाथपुरी के मार्ग की और चली गई । उसे यह भी ज्ञात नहीं हुआ कि वह कितनी दूरी चल चुकी है । लगातार कई दिनो तक चलते रहने के कारण से अब कर्मा जी को अत्यन्त पीडा होने लगी थी वह वृक्षों की पत्तियां खाकर आगे बढी राह में कर्मा भजन गाती हुई जगन्नाथ जी के विशाल मन्दिर के प्रमुख द्वार पर पहुची । एक थाली में खिचडी सजाकर पुजारी के समक्ष भगवान को भोग लगाने हेतु रख दी । पुजारियों ने इस दक्षिणाहीन जजमान को धक्के मारकर बाहर कर दिया । बेचारी उस खिचडी की थाली को उठाकर समुद्र तट की और चल दी और समुद्र के किनारे बैठकर भगवान की आराधना करने लगी कि घट-घट व्यापी भगवान अवश्य ही आवेंगे और इस विश्वास में आंख बन्द करके भगवान से अनुनय-विनय करने लगी कि जब तक आप आकर भोग नही लगावेंगे तब तक मै अन्न ग्रहण नही करूंगी, यह तो भोग प्रभु के निमित्त बना है । सुबह से शाम तक भगवान की प्रतीक्षा करती रही । धीरे धीरे रात ढलती गई और प्रभु के ध्यान में मग्न हो गई । एकाएक भगवान की आवाज आई कि मां, तू कहां है? मुझे भूख लगी है। इतने अंधकार में भी उसे प्रभु की मोहनी सूरत के दर्शन हुए और प्रभु को अपनी गोद में बैठाकर खिचडी खिलाने लगी । इसके बाद कर्मा मां ने प्रभु की छोडी हुई खिचडी ग्रहण की और आन्नद विभोर होकर सो गई ।
सुबह के प्रथम दर्शन में पुजारी ने देखा कि भगवान के ओंठ एवं गालों पर खिचडी लगी हुई है तभी पुजारी लोग बौखला उठे और कहने लगे कि यह करतूत उसी कर्मा की है जो चोरी से आकर प्रभु के मुंह पर खिचडी लगाकर भाग गई है । राज दरबार में शिकायत हुई कि कर्मा बाई नाम की औरत ने भगवान के विग्रह को अपवित्र कर दिया । सभी लोग ढूढते हुऐ कर्मा के पास समुद्र तट पहुँचे और फरसा से उसके हाथ काटने की राजा द्वारा आज्ञा दी गई। परन्तु प्रभु का कौतुक देखिए । ज्यों ही उस पर फरसे से वार किया गया तो दो गौरवर्ण हाथ कटकर सामने गिरे, परन्तु कर्माबाई ज्यो की त्यों खडी रही राज दरबारियों ने फिर से वार किया,परन्तु इस बार दो गौरवर्ण हाथ कंगन पहने हुए गिरे । तभी राज दरबारियों ने देखा की वह तो अपनी पूर्वस्थिती में खड़ी है। अन्यायियों ने फिर से वार किया तो इस बार दो श्यामवर्ण हाथ एक में चक्र और दूसरे में कमल लियें हुये गिरे । जब दरबारियों को इस पर भी ज्ञान नहीं हुआ और पागलों की तरह कर्मा पर वार करने लगें तब आकाशवाणी हुई-अरे दुष्टों ! तुम सब भाग जाओ नही तो सर्वनाश हो जाएगा। जिन्होंने हाथ काटे थे उनके हाथ गल गए । कुछ लोग भाग खडे हुए और कहने लगे यह जादूगरनी हैं । यह खबर राज दरबार में पहुंची तो राजा भी व्याकुल होकर तथ्य को मालूम करने के लिये जगन्नाथ जी के मन्दिर में गये । वहाँ राजा ने देखा कि बलदेव जी, सुभद्रा जी एवं भगवान जगन्नाथ जी के हाथ कटे हैं । तब वहाँ के सारे पुजारियों एवं परिवारो में हाहाकार मच गया और कहने लगे कि अनर्थ हो गया । राजा को स्वप्न में प्रभु नें आज्ञा दी कि हाथ तो माँ को अर्पित हो गये अब हम बगैर हाथ के ही रहेगे तथा प्रति वर्ष कर्मा के नाम की ही खिचडी का भोग पाते रहेंगे ।
उस दिन से आज तक इसी पुण्यतिथि चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी , जिस दिन की यह घटना हैं, उसी तिथि से भगवान जगदीश स्वामी के मन्दिरों में भक्त कर्माबाई की खिचडी को ही सर्वप्रथम भगवान को भोग लगाया जाता हैं एवं प्रसाद के रूप में खिचड़ी प्रसाद वितरित की जाती है जिसे “महाप्रसाद” कहते हैं। तभी से यह कहावत हुई है-
“जगन्नाथ का भात -जगत पसारे हाथ”
सम्पूर्ण भारत वर्ष में जहाँ जहाँ भी भगवान जगन्नाथ स्वामी के मंदिर है वहा बहुतायत से उन पर हमारे स्वजातीय तैलिक बन्धुओं का स्वामित्व है जिसका श्रेय हमारी साहू समाज की आराध्य देवी भक्त शिरोमणि संत माता कर्मा को ही है ।
साहू स्वजन कर्मा जयंती के अवसर पर अपने अपने घरों में पाँच दीप अवश्य जलाकर परिवार सहित भक्त माता कर्मा की सामूहिक आरती करें तथा खिचड़ी प्रसाद का वितरण करें।
सभी देशवासियों को भक्तमाता कर्मा की 1008 वीं जयंती की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
नेतराम साहू
व्याख्याता (रसायन) शा उ मा वि तरकेला
सह संयोजक, छग प्रदेश साहू संघ कर्मचारी-अधिकारी प्रकोष्ठ छत्तीसगढ़ (पं.क्र.33/61)



