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“नहीं सूरज, ये मृत्यु लोक है…” – राजनीति की नश्वरता पर एक कटाक्ष विशेष लेख — हेमसागर श्रीवास

रायगढ़। “नहीं सूरज, ये मृत्यु लोक है… यहां जो आया है, उसे जाना ही होगा।” ये पंक्तियाँ न केवल मानव जीवन की सच्चाई को उजागर करती हैं, बल्कि सत्ता और राजनीति की अस्थिरता को भी साफ तौर पर दर्शाती हैं। इस धरती पर कुछ भी स्थायी नहीं है — न नाम, न पद, न ही सम्मान। जो आज सिरमौर है, वह कल गुमनामी में खो सकता है। राजनीति में यह परिवर्तन और भी तीव्र है। जो आज माइक पर जनता की आवाज़ बनता है, वही कल जनता के सवालों से घिरा होता है। इस संदर्भ में एक प्रश्न स्वतः उठता है — “तो उमेश पटेल क्या चीज़ है?” छत्तीसगढ़ की राजनीति में उमेश पटेल एक समय चमकता हुआ नाम रहा है। शिक्षा मंत्री से लेकर कांग्रेस के युवा चेहरा तक, उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन जनता का मूड, वक्त की चाल और परिस्थितियों का रंग पल भर में बदल जाता है। और जब पूरी दुनिया नश्वर है, तो कोई भी नेता स्थायी कैसे हो सकता है? आज जो कुर्सी पर है, कल उसे भी जवाब देना होगा। जनता अब पहले जैसी नहीं रही — जागरूक है, प्रश्न करती है और बदलाव की मांग करती है। ऐसे में किसी भी नेता को यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति सेवा का माध्यम है, स्वामित्व का नहीं। “ये दुनिया नश्वर है, यहां कुछ भी स्थिर नहीं है…” — यही सिद्धांत लोकतंत्र की नींव है। और यही कारण है कि हर जनप्रतिनिधि को समय रहते अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से करना चाहिए, वरना जनता बदलाव का फैसला करने में देर नहीं लगाती।

Editor Hemsagar shrivas

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