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आदिवासी दिवस की महत्ता एवं मूल उद्देश्यों से आज भी अनभिज्ञ है लोग: डिग्री लाल जगत

विश्व आदिवासी दिवस मनाने से पहले हम लोगो को पता होना चाहिए कि आदिवासी कौन होते हैं? और आदिवासी शब्द कैसे बना है आदिवासी शब्द दो शब्दों से आदि और वासी से मिलकर निर्मित है, इसका अर्थ है जो आदिकाल से वास कर रहा हो अर्थात मूलनिवासी हो। भारतवर्ष में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है। भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति का उपयोग किया गया है। भारत की प्रमुख आदिवासी समुदायों में संथाल गॉड मुंडा वोडोए भील खासी सहरिया गरासिया मीणा उरांव बिरोह आदि है। आदिवासियों का अपना धर्म है यह प्रकृति के पूजक हैं और जंगल पहाड़ नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं, इनके अपने पारंपरिक परिधान होते हैं जो ज्यादातर प्रकृति से जुड़े होते हैं, इनका रहन-सहन बोलचाल खाद्य सामग्री भी अलग होता है भारत में आदिवासी मुख्य रूप से उड़ीसा ,मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़ ,राजस्थान ,गुजरात ,महाराष्ट्र ,आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल ,में अल्पसंख्यक हैं जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों में यह बहुसंख्यक हैं जैसे मिजोरम में बहुसंख्यक हैं।
विश्व आदिवासी दिवस की शुरुआत, संयुक्त राष्ट्र संघ जिसका मुख्य उद्देश्य पूरे विश्व में शांति स्थापना और बंधुतापूर्ण संपर्क देशों के बीच बढ़ाना है, 1994 में प्रतिवर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया था। जनजातीय समाज की समस्याओं जैसे गरीबी शिक्षा स्वास्थ्य सुविधा का अभाव बेरोजगारी एवं बंधुआ मजदूर आदि निराकरण हेतु और विश्व के ध्यानाकर्षण के लिए यह दिवस मनाया जाता है। यह दिवस की उद्देश्य यह है कि आदिवासियों को उनका हक मिल सके आदिवासियों को अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण भाषा संस्कृति इतिहास के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में विश्व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्व का प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस सम्मेलन आयोजित किया गया था। आज दुनिया भर के देशों में आदिवासी दिवस मनाया जाता है। लेकिन इसके बावजूद दुनिया भर में आदिवासियों की हालत मैं शायद ही कोई उल्लेखनीय सुधार हुई हो ये विडंबना है की तेजी से आर्थिक विकास के बावजूद आदिवासी समाज विभिन्न देशों की मुख्यधारा से आज भी बाहर है।

Editor Hemsagar shrivas

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