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शासन कोई भी हो, संकट में हमेशा किसान — जमीन से मंडी तक परेशानियाँ क्यों कम नहीं होतीं?

रायगढ़ :-देश में शासन और सत्ता चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, सबसे अधिक परेशान हमेशा किसान ही दिखाई देता है। यही वह मेहनतकश व्यक्ति है जो खेतों में पसीना बहाकर पूरे देश को अन्न प्रदान करता है और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बावजूद जब धान उपार्जन केंद्रों में खरीदी की बारी आती है, तो सबसे ज्यादा परेशानी उसी किसान को उठानी पड़ती है जिसने फसल उगाने के लिए कड़ी मेहनत की होती है।

उपार्जन केंद्रों में पंजीयन से लेकर तौल प्रक्रिया तक, किसान को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कभी धान में नमी का बहाना बनाकर उसे घंटों लाइन में खड़ा रखा जाता है, तो कभी बारदाने की कमी बताकर खरीदी रोक दी जाती है। कई बार तो किसानों को मजबूरी में अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ जाती है। सरकारें बदलती रही हैं, लेकिन किसानों के दर्द को कम करने वाली व्यवस्थाएँ आज भी मजबूत नहीं हो पाई हैं।

सबसे बड़ी समस्या तब सामने आती है जब किसी उद्योग, कंपनी या सरकारी परियोजना के लिए किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जाता है। नियमों का हवाला देते हुए मुआवजा निर्धारित तो किया जाता है, लेकिन अधिकांश किसान इसकी सही कीमत से वंचित रह जाते हैं। और अगर कोई किसान अपनी जमीन देने से मना कर दे, तो प्रशासन विभिन्न माध्यमों से दबाव बनाकर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी ही कर लेता है। ऐसे में किसान अपने ही खेत से बेदखल होने की पीड़ा झेलता है।

देश में किसानों के हित में बड़े और प्रभावी कदम उठाए जाने की जरूरत है, ताकि उन्हें उनकी फसल और जमीन दोनों का उचित मूल्य मिल सके। जब तक किसान सुरक्षित और संतुष्ट नहीं होगा, तब तक कृषि व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती और न ही देश की अर्थव्यवस्था स्थिर रह सकती है। किसान मजबूत होगा, तभी देश मजबूत होगा—यह समझने की आवश्यकता सभी को है।

Editor Hemsagar shrivas

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