कम प्रतिशत पाने वाले छात्र छात्रों की शासन की सूची से बाहर क्यों? प्रतिभा नहीं, फोटो आंकड़ों पर टिकी है शिक्षा नीति!

रायगढ़ :-शासन–प्रशासन की शिक्षा नीतियों पर एक गंभीर सवाल लगातार खड़ा हो रहा है—क्या कम प्रतिशत पाने वाले छात्र-छात्रा इस सिस्टम का हिस्सा नहीं हैं? हर साल परीक्षा परिणाम आते हैं, मंच सजते हैं, मेधावी बच्चों को सम्मानित किया जाता है, फोटो खिंचती है, आंकड़े जारी होते हैं और शासन अपनी पीठ थपथपा लेता है। लेकिन जो छात्र कम अंक लाते हैं, जिनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि कमजोर है, जिनके पास संसाधन नहीं हैं—उनका गुणवत्ता आकलन आखिर कब होगा?
आज जरूरत इस बात की है कि केवल अंकों के आधार पर नहीं, बल्कि रुचि, क्षमता और हुनर के आधार पर छात्रों का मूल्यांकन किया जाए। कम प्रतिशत पाने वाले छात्र जरूरी नहीं कि अयोग्य हों, बल्कि कई बार वे परिस्थिति के शिकार होते हैं—गरीबी, पारिवारिक जिम्मेदारी, संसाधनों की कमी और मार्गदर्शन का अभाव। ऐसे छात्रों को यदि समय रहते स्किल, हुनर और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि शासन की योजनाएं केवल प्रतिभावान छात्रों के इर्द-गिर्द घूमती हैं, क्योंकि वहीं से पुरस्कार, प्रमाण पत्र और फोटो मिलते हैं। शिक्षा विभाग का फोकस सुधार पर नहीं, बल्कि दिखावे के आंकड़ों पर है। चाहे किसी भी दल की सरकार हो, तस्वीरें बदलती हैं लेकिन सोच नहीं।
प्रश्न यह भी है कि कम प्रतिशत पाने वाले छात्रों की गणना कब होगी? उनके लिए अलग काउंसलिंग, स्किल डेवलपमेंट, आईटीआई, हस्तशिल्प, कृषि, तकनीकी व स्थानीय रोजगार आधारित प्रशिक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती? अगर शासन वास्तव में शिक्षा सुधार चाहता है, तो उसे मंच से नीचे उतरकर कक्षा के आखिरी बेंच तक देखना होगा।
फिलहाल तो यही लगता है कि फोटोग्राफी और आंकड़ों का खेल चलता रहेगा, और हजारों छात्र हुनर के अभाव में भविष्य की दौड़ से बाहर होते रहेंगे। सवाल सिर्फ शिक्षा का नहीं, नीति और नीयत का है।



