कलेक्टर दौरे से पहले सजती है व्यवस्था, निरीक्षण या आँख-मिचौली का खेल?

रायगढ़ :-यह बात अब समझ से परे नहीं, बल्कि प्रमाणिक सच्चाई बन चुकी है कि जहाँ जिला कलेक्टर साहब का दौरा प्रस्तावित होता है, वहाँ उसके एक दिन पहले ही पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है। व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त, फाइलें अपडेट, कर्मचारी सतर्क और अव्यवस्थाएँ अचानक गायब हो जाती हैं। सवाल यह है कि क्या यही है वास्तविक प्रशासनिक निगरानी?
आज जिला कलेक्टर साहब का दौरा पुसौर और कोसमंदा धान उपार्जन केंद्र में हुआ। निरीक्षण के दौरान धान खरीदी से जुड़ी सभी व्यवस्थाएँ बेहतरीन नजर आईं—चाहे तौल व्यवस्था हो, भुगतान प्रक्रिया या रिकॉर्ड संधारण। देखने में सब कुछ आदर्श था। लेकिन इसके पीछे की हकीकत भी किसी से छिपी नहीं है।
बीते दिन ही तहसीलदार साहब सहित अन्य आला अधिकारी दोनों मंडियों का दौरा कर चुके थे। उपार्जन केंद्र प्रभारियों को साफ-साफ अवगत करा दिया गया था कि “कल साहब आने वाले हैं।” बस फिर क्या था—रातों-रात कमियाँ दुरुस्त हुईं, गड़बड़ियाँ ढंकी गईं और निरीक्षण के दिन सब कुछ चकाचक नजर आने लगा। इसके बाद हुआ एक “बेहतरीन निरीक्षण”, जिसकी रिपोर्ट भी स्वाभाविक रूप से संतोषजनक रही।
अब सवाल उठता है कि क्या यही प्रमाणिकता है? अगर निरीक्षण पहले से घोषित होंगे, अधिकारी पहले से तैयारी करवा देंगे, तो फिर वास्तविक स्थिति सामने कैसे आएगी? आम दिनों में जिन समस्याओं से किसान और मजदूर जूझते हैं—देरी, अव्यवस्था, दबाव—वे सब निरीक्षण के दिन अचानक कहाँ गायब हो जाती हैं?
कब तक यह आँख-मिचौली का खेल चलता रहेगा? कब ऐसे औचक निरीक्षण होंगे, जिनमें बिना पूर्व सूचना के हकीकत सामने आए? अगर व्यवस्था सच में इतनी ही बेहतर है, तो फिर हर दिन वैसी ही क्यों नहीं रहती?
फिलहाल तो यही लगता है कि सिस्टम ने निरीक्षण को भी एक औपचारिक रस्म बना दिया है। खैर… राम जाने! लेकिन जनता अब सवाल पूछने लगी है, और यही सवाल प्रशासन की असली परीक्षा हैं।



