गरीबों के हक पर डाका! जिला प्रशासन–खाद्य विभाग की मिलीभगत से पुसौर ब्लॉक में ही क्यों भेजा जा रहा पाखड़ चावल?

रायगढ़ जिले के पुसौर ब्लॉक में राशन व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि जिला प्रशासन और खाद्य विभाग के संरक्षण में पाखड़ (निम्न गुणवत्ता) चावल को चुनिंदा राशन दुकानों—विशेषकर पुसौर ब्लॉक—में ही भेजा जा रहा है। यह व्यवस्था नहीं, बल्कि गरीबों के हक पर खुला हमला है।
सरकारी गोदामों से निकलने वाला चावल क्या गुणवत्ता जांच से मुक्त है? यदि नहीं, तो फिर अमानक चावल केवल पुसौर की दुकानों तक सीमित क्यों? क्या जिले के अन्य ब्लॉकों के हितग्राही अधिक “भाग्यशाली” हैं, या पुसौर के गरीबों को ही प्रयोगशाला बना दिया गया है? यह भेदभाव प्रशासनिक संरक्षण की बू देता है।
स्थानीय हितग्राहियों का कहना है कि पाखड़ चावल से भोजन पकाना मुश्किल है, स्वाद और पौष्टिकता पर असर पड़ता है, और कई बार चावल टूटे व बदबूदार मिलते हैं। शिकायतों के बावजूद निरीक्षण दिखावटी, कार्रवाई शून्य और जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं। सवाल यह भी है कि राशन दुकानों पर तैनात कर्मियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं हो रही?
खाद्य सुरक्षा कानून का उद्देश्य गरीबों को सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। लेकिन पुसौर में यह कानून कागजों तक सिमटकर रह गया है। क्या जिला प्रशासन यह स्पष्ट करेगा कि गुणवत्ता प्रमाणपत्र, लॉट-वार जांच रिपोर्ट, और सप्लाई चेन की पारदर्शिता कहाँ है?
अब वक्त है कि कलेक्टर स्तर पर तत्काल उच्चस्तरीय जांच हो, दोषी अधिकारियों व आपूर्तिकर्ताओं पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए, और पुसौर के हितग्राहियों को मानक चावल उपलब्ध कराया जाए। अन्यथा यह सवाल और गूंजेगा—क्या रायगढ़ का प्रशासन केवल गरीबों के हक मारने के लिए है?



