ब्रेकिंग न्यूज़

खरसिया विधानसभा क्षेत्र मे किसानों के नाम पर राजनीति: धान खरीदी में नेताओं की चापलूसी उजागर!

रायगढ़ — जैसे ही धान उपार्जन का सीजन शुरू होता है, वैसे ही कुछ नेताओं की “बल्ले-बल्ले” शुरू हो जाती है। उपार्जन केंद्रों में किसान अपनी महीनों की मेहनत से उपजाई गई धान लेकर लाइन में खड़े रहते हैं, वहीं कई नेता खुद को किसानों का शुभचिंतक साबित करने के लिए खरीदी केंद्रों का दौरा करते नजर आते हैं। सवाल यह है कि क्या यह दौरे वास्तव में किसानों के हित में हैं या सिर्फ राजनीतिक दिखावा?

खरीदी केंद्रों में देखने को मिल रहा है कि नेता फोटो खिंचवाते हैं, अधिकारियों से औपचारिक बातचीत करते हैं और मीडिया के सामने किसानों की चिंता जताते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इन नेताओं में से कई को धान खरीदी की नीति, नियम और प्रक्रिया की बुनियादी जानकारी तक नहीं है। किसानों की सबसे बड़ी समस्याओं में शामिल बरदाना (धान भरने की बोरी) क्या होता है, इसकी जानकारी भी कई नेताओं को नहीं है।

किसान बताते हैं कि उन्हें बरदाना की कमी, तौल में देरी, नमी के नाम पर धान लौटाना और भुगतान में विलंब जैसी समस्याओं से रोज जूझना पड़ता है। लेकिन जब किसान अपनी वास्तविक परेशानी नेताओं के सामने रखते हैं, तो उन्हें सिर्फ आश्वासन और सांत्वना मिलती है, समाधान नहीं। नेता केंद्र से निकलते ही अगली सभा या कार्यक्रम में व्यस्त हो जाते हैं।

स्थानीय किसानों का कहना है कि यदि नेता सच में किसान हितैषी हैं, तो उन्हें नीतिगत खामियों को समझकर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाना चाहिए, न कि सिर्फ खरीदी केंद्र में जाकर चक्कर लगाना चाहिए। धान खरीदी का सीजन किसानों के लिए परीक्षा की घड़ी होता है, लेकिन नेताओं के लिए यह राजनीतिक अवसर बन जाता है।

कुल मिलाकर, धान खरीदी केंद्रों में चल रही यह राजनीति किसानों के जख्मों पर मरहम नहीं, बल्कि चापलूसी और दिखावे की खेती है। जब तक नीति और जमीन पर हालात नहीं सुधरते, तब तक किसानों को इन दौरों से राहत मिलने वाली नहीं है।

Editor Hemsagar shrivas

Related Articles

Back to top button