राजनीति में मशगूल नेता, तड़पता परिवार—यह कैसी जिम्मेदारी ?
राजनीति और परिवार : जिम्मेदारी से भागता नेतृत्व?

खरसिया :-लोकतंत्र में राजनेता को जनसेवक माना जाता है, लेकिन क्या जनसेवा का अर्थ यह है कि वह अपने ही परिवार, पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ ले? आज यह सवाल समाज के हर वर्ग में चर्चा का विषय बनता जा रहा है। राजनीति करना कोई अपराध नहीं है, लेकिन राजनीति के नाम पर परिवार को तड़पता छोड़ देना निश्चित ही एक गंभीर नैतिक प्रश्न खड़ा करता है।
अक्सर देखा जाता है कि कई नेता राजनीति में इतने डूब जाते हैं कि घर-परिवार उनकी प्राथमिकताओं से बाहर हो जाता है। बच्चे अपने माता-पिता के स्नेह से वंचित रह जाते हैं, पत्नी या परिवार के बुजुर्ग मानसिक और सामाजिक पीड़ा झेलते हैं। नेता सार्वजनिक मंचों पर आदर्शों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन निजी जीवन में वही आदर्श टूटते नजर आते हैं। क्या यह व्यवहार उचित कहा जा सकता है?
राजनीति का उद्देश्य समाज को दिशा देना है। यदि कोई व्यक्ति अपने ही परिवार को संभाल नहीं पा रहा, तो वह समाज का मार्गदर्शन कैसे करेगा? बच्चों का भविष्य केवल आर्थिक संसाधनों से नहीं बनता, उन्हें समय, मार्गदर्शन और भावनात्मक सहारा भी चाहिए। राजनीति के नाम पर बच्चों को अकेला छोड़ देना न केवल पारिवारिक विफलता है, बल्कि सामाजिक अपराध के समान भी है।
यह भी सच है कि राजनीति में समय, संघर्ष और त्याग की आवश्यकता होती है, लेकिन त्याग का अर्थ यह नहीं कि अपने कर्तव्यों से पलायन किया जाए। परिवार की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी जनता के प्रति जिम्मेदारी। जो नेता अपने अधिकारों का उपयोग करता है, उसे अपने दायित्वों का निर्वहन भी पूरी निष्ठा से करना चाहिए।
समाज को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो राजनीति और परिवार के बीच संतुलन बना सके। ऐसा नेतृत्व ही सच्चे अर्थों में आदर्श कहलाने योग्य है। राजनीति यदि इंसानियत और संवेदनाओं को कुचल दे, तो वह जनसेवा नहीं, बल्कि आत्मकेंद्रित स्वार्थ बन जाती है। अब समय है कि नेता आत्ममंथन करें और यह समझें कि परिवार की अनदेखी कर की गई राजनीति किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं है।



